Monday, April 6, 2026

युद्ध

जब युद्ध होते हैं 
खुश होते हैं गिद्ध 
लाशों के ढेर देखकर 
ऊंची आवाज में बोलते हैं भेड़िये
मांस के लोथड़े देखकर

सिर्फ जीत के लिए
नहीं होते युद्ध
गिद्धों व भेड़ियों की खाल में छिपे
इंसानों की भूख शांत करने को 
रचे जाते हैं युद्ध 
मरने का भय दिखाकर 
शांति का झूठ फैलाकर 
लाखों लाशें बिछाने के लिए 
लड़े जाते हैं युद्ध 
अहंकार की तृप्ति के लिए 
गढ़े जाते हैं युद्ध 
दौलत कमाने के लिए 
लड़े जाते हैं युद्ध 

Friday, February 20, 2026

दस्तक

कोई दस्तक नहीं देता अब दरवाजे पर 
इसीलिए इन दिनों खुला रहता है मेरा दर..
इसी आस में कि आएगा कोई
इक दस्तक सुनने को बेचैन मैं
हर छोटी सी आहट पर दौड़ पड़ता हूं
वक़्त की परछाईं पकड़ने.. लेकिन
वक़्त कब किसके हाथ आया है
हर बार वक़्त के फिसल जाने पर 
मैं कोसता हूं बीते वक़्त को 
मकड़ी के जाल से इस कालचक्र में 
उलझा हुआ सा मैं 
कर रहा हूं इक दस्तक का इंतजार...


Monday, October 6, 2025

दोराहा

एक दोराहे पर है खड़ी ज़िंदगी
एक दोराहे पर है पड़ी ज़िंदगी

चलते-चलते यूं ही रुक गया हूं कहीं 
जाने किस बात पर है अड़ी ज़िंदगी 

ये मजमे, ये रौनक, ये वीरानगी
ख़त्म कर देगी सब ये घड़ी ज़िंदगी

इम्तिहां जिंदगी के हैं मुश्किल बहुत
दर-ब-दर होके इनसे लड़ी ज़िंदगी

ढंग जीने का ना हमको आया कभी 
कशमकश है ये जालिम बड़ी ज़िंदगी 

उम्र गुज़री है सारी तक़ब्बुर में पर 
मौत के दर पे आकर खड़ी ज़िंदगी 

Saturday, May 17, 2025

इम्तिहान

ज़िंदगी में अभी इम्तिहान और हैं
आज़माइश के कुछ आसमान और हैं 
मुश्किलें हैं सफर में बहुत हमसफर
राह-ए-मंजिल में पर निगहबान और हैं 
इक गुलिस्तां सजाया था हमने यहां 
गुल खिले हैं, मगर बागबान और हैं
उनकी महफिल में हम हो गए अजनबी 
बात करते नहीं, मेज़बान और हैं
उनके दर से मैं खाली गया लौट कर 
बदले बदले से हैं पासबान और हैं 
इस समंदर में हैं सारे भटके हुए
कश्तियों के यहां बादबान और हैं 

जीवन

यूं ही जीवन कट जाएगा
बोझ ये सारा घट जाएगा 
काले बादल सा जो फैला 
सब अंधियारा छंट जाएगा 
सबक दिए जो इस जीवन ने 
पाले तुमने जो उपवन में
उनको साथ हमेशा रखना
मुश्किल वक्त भी कट जाएगा 
इक छोटी सी है फुलवारी 
दिखती है जो दुनिया सारी 
इसके फूलों की खुशबू से 
राग-द्वेष सब हट जाएगा 
अहंकार का फेर है सारा
मिट्टी जैसा है जग सारा
जब देगी आवाज ये मिट्टी
भेद ये सारा मिट जाएगा

Saturday, June 15, 2024

पथिक

अंगारों पर चलता जाए
बिना रुके जो बढ़ता जाए
घोर भयावह अंधियारे में 
राह नई इक गढ़ता जाए 
पथिक वही है...

तपती-जलती बंजर भू पर 
शूल भरे रस्तों के ऊपर 
मक्कारों के चक्रव्यूह में 
बिना अस्त्र जो लड़ता जाए 
पथिक वही है...

सूरज की किरणों से लड़कर
लहरों का भी वेग कुचलकर
मीलों फैले सहराओं में
आंधी बनकर उड़ता जाए 
पथिक वही है...

मन के मोह-पाश को छोड़ 
जीवन-मरण का बंधन तोड़ 
अनसुलझे इस भवसागर में 
बन संन्यासी बढ़ता जाए 
पथिक वही है...

Friday, December 22, 2023

यह इमरोज-अमृता की अनोखी प्रेम कहानी का अंत नहीं.. नई शुरुआत है

नितिन उपमन्यु
चंडीगढ़। जाने-माने कलाकार और कवि इमरोज के निधन के साथ ही एक अनोखी प्रेम कहानी फिर जीवंत हो उठी है। दरअसल, इमरोज का निधन इस कहानी का अंत नहीं, ब​ल्कि नई शुरुआत है। एक ऐसी कहानी, जिसने दशकों तक साहित्य और कला प्रेमियों को मदहोश किए रखा। जिसने प्रेम की नई परिभाषा गढ़ी। जिसने दुनिया को बताया कि प्रेम सिर्फ विवाह बंधन में बंधना ही नहीं, ब​ल्कि प्रेम के आकाश में उन्मुक्त होकर उड़ना भी है।
ख्यात पंजाबी कवियत्री अमृता प्रीतम और इमरोज अपने अनूठे रिश्ते के कारण हमेशा चर्चा में रहे और अब जबकि दोनों इस जहान में नहीं हैं, तब भी चर्चा में हैं। दोनों ने कभी शादी नहीं की, लेकिन 40 साल तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। इमरोज का जन्‍म 26 जनवरी, 1926 को अविभाजित भारत के लायलपुर (अब पाकिस्तान में) हुआ था। उनका असली नाम इंद्रजीत सिंह था, लेकिन वे इमरोज नाम से ही जाने गए। अमृता उन्हें 'जीत' कहती थीं।
2005 में अमृता के निधन के बावजूद इमरोज ने उन्हें अपनी स्मृतियों में जीवित रखा। इमरोज कहते थे 'वो यहीं है, घर पर ही है, कहीं नहीं गई। यहीं, इन दीवारों के भीतर, वह रहती है, कभी नहीं जाती।' इन भावनाओं को इमरोज ने 97 वर्ष की उम्र तक बनाए रखा। अपनी एक कविता में इमरोज कहते हैं- जीने लगो, तो करना फूल जिंदगी के हवाले... जाने लगो, तो करना बीज धरती के हवाले...। अपने निधन से पहले इमरोज प्यार का ऐसा बीज धरती के हवाले कर गए हैं, जो आने वाले कई वर्षों तक फूल बनकर महकता रहेगा।
'अमृता एंड इमरोज- ए लव स्टोरी' किताब की ले​खिका उमा त्रिलोक इमरोज व अमृता की नजदीकी दोस्त रही हैं। उमा कहती हैं कि अमृता और इमरोज के रिश्ते में आजादी बहुत है। बहुत कम लोगों को पता है कि वो अलग-अलग कमरों में रहते थे एक ही घर में और जब इसका जिक्र होता था तो इमरोज कहते थे कि एक-दूसरे की खुशबू तो आती है। ऐसा जोड़ा मैंने बहुत कम देखा है कि एक दूसरे पर इतनी निर्भरता है, लेकिन कोई दावा नहीं है।

मैं तैनूं फेर मिलांगी...
अमृता प्रीतम भले ही 40 साल तक इमरोज के साथ लिव इन में रहीं, लेकिन यह जन्म उन्होंने शायर साहिर लु​धियानवी नाम कर दिया था। वह हमेशा उनसे ही मोहब्बत करती रहीं। इमरोज के लिए उन्होंने कोई और जन्म तय कर रखा था। अपनी कालजयी रचना 'मैं तैनूं फेर मिलांगी' में अमृता लिखती हैं... मैं तुझे फिर मिलूंगी, कहां-कैसे पता नहीं... शायद तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बन, तेरे कैनवास पर उतरूंगी... या तेरे कैनवास पर, एक रहस्यमयी लकीर बन खामोश से तुझे देखती रहूंगी... मैं तुझे फिर मिलूंगी, कहां-कैसे पता नहीं। अपनी इस रचना में अमृता ने जो वादा किया था, इमरोज अपने जीवन के बाद उसके पूरा होने का विश्वास लिए इस दुनिया से विदा हो गए।

वो खूबसूरत दिन..
दोनों की प्रेम कहानी की शुरुआत पंजाब के पठानकोट से हुई थी, जो पंजाब की गलियों से निकल कर दिल्ली-मुंबई से होते हुए देश-विदेश तक पहुंची। अमृता के प्रति इमरोज के प्रेम को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया। खराब स्वास्थ्य में भी इमरोज ने अमृता की यादों को संजोया, उनके रेखाचित्रों और तस्वीरों से घिरे रहे और कविता व कला के माध्यम से उनकी प्रेम कहानी को अमर बनाया। एक कलाकार से कवि बनने के बाद इमरोज के शब्द अमृता के प्रति उनके अटूट स्नेह को दर्शाते हैं। इमरोज ने लिखा था- तेरे साथ जिए वो सब खूबसूरत दिन रात, अब अपने आप मेरी कविताएं बनते जा रहे हैं...। अमृता के अस्वस्थ रहने के बाद इमरोज ने कविताएं लिखना शुरू किया और उनकी मृत्यु के बाद भी उन्होंने उन्हें समर्पित कई कविताएं लिखीं। उनके चार काव्य संग्रह प्रका​शित हुए, जिनमें सभी कविताएं अमृता को समर्पित थीं। इनमें 'जश्न जारी है', 'मनचाहा ही रिश्ता' और 'रंग तेरे मेरे' शामिल हैं।

रिश्ते की खुशबू...
पंजाबी कहानीकार व कवि जसबीर सिंह राणा कहते हैं, दोनों का रिश्ता कला, प्यार, बराबरी और आपसी समझ वाला था, जिसकी खुशबू आज भी महसूस की जा सकती है। दोनों ने अपना ज्यादातर समय दिल्ली के हौज खास इलाके में गुजारा। अखबार के माध्यम से दोनों संपर्क में आए। उनका लिखा साहित्य पंजाब में आने वाली पीढि़यों को लाइट हाउस की तरह रोशनी देता रहेगा। अमृतसर के खालसा कॉलेज के प्रो. आत्म रंधावा कहते हैं कि नागमणि पत्रिका अमृता प्रीतम के निधन तक 35 वर्षों से अधिक समय तक प्रकाशित होती रही और इमरोज इसके अंतिम अंक तक एक कलाकार के रूप में इससे जुड़े रहे।

Friday, April 21, 2023

मां का जन्मदिन

मां का एक और जन्मदिन बीत गया 
चुपचाप, ख़ामोश सा 
सब के जन्मदिन से बिल्कुल अलग 

सुबह-सुबह कोई नहीं उठा 
न आंगन में लिपाई हुई
न पूजा की थाली सजी

हलवे के लिए बादाम भिगोने थे रात में 
लेकिन याद ही नहीं रहा किसी को

मीलों दूर से बस एक फोन आया 
कैसी हो मां...? 
कुछ खास नहीं बनाया इस बार?
जवाब मिला- तुम आओगे 
तो बनाऊंगी कुछ... 

मां के चेहरे की मुस्कान 
मुझे मीलों दूर से साफ दिख गई
हमेशा की तरह... शफ़्फ़ाक!!!

इंसाफ

अभी-अभी आई इक ताज़ा ख़बर
कुछ दंगाई, बलात्कारी
रिहा हो गए... बाइज़्ज़त!!

जश्न मना, ढोल बजा 
गले हारों से लद गए 
निर्लज्ज चेहरे खिल गए 

न्याय की देवी निहारती रही 
बेबस होकर यह दृश्य 

न्याय के देवता करते रहे कागज़ काले 
काली अंधेरी कोठरी में घुट घट रोता रहा इंसाफ 

न्याय की यह नई परिभाषा 
बहुत भयानक है 
बहुत भयानक...

इक रोज़...

इक रोज चलूंगा यूं ही
लंबी सुनसान सड़क पर
कुछ कदम नंगे पांव

फिर यूं ही चढ़ जाऊंगा
इक बड़ी चट्टान पर
हवा में हाथ खोल चिल्लाऊंगा

कुछ पल बैठ जाऊंगा
जंगल की पगडंडी पर 
और ढलान पर लेटूंगा कुछ देर 

बारिश में भीगते हुए
गाऊंगा कोई विरह गीत
इक रोज...

खेत की मेढ़ पर बैठकर 
बर्फ से ढकी चोटियां निहारूंगा

गली में बच्चों संग खेलूंगा 
कोई पुराना खेल

मां की गोद में सिर रख
सुनूंगा कोई अधूरी कहानी

पिता की किताब को छाती पर रख
सो जाऊंगा कुछ देर

तुम देखना!
मैं करूंगा ये सब
इक रोज़...

Saturday, October 22, 2022

शब्द

शब्द गुम हैं
अब नहीं आते ज़ुबां पर
ज़हन में भी नहीं
बहुत ज़ोर देकर
जब सोचता हूं
तो उलझ जाता हूं
फिर उन्हीं शब्दों में
ये कैसी बेबसी है
कैसी लाचारी है
कोई अज्ञात भय हो रहा हावी है
कभी लगता है...
शब्द तो बहुत हैं
शायद, हिम्मत नहीं है
अपने ही शब्दों को
जब रखता हूं सामने
तो डरने लगता हूं
भागता हूं हालात से
कभी लगता है...
शब्द तो बहुत हैं
पर आदत हो गई है
चुप रहने की
चुप कराने वालों के आगे
आत्मसमर्पण करने की
आंखें मूंद लेने की
दमन का यह मूक समर्थन
चुभता है अंदर तक
ज़ुबां ख़ामोश रहती है
क्योंकि शब्द गुम हैं...

Sunday, September 25, 2022

सितारा

छिपा घने बादल में 
जो एक सितारा था

जिसकी एक झलक से
मिटता अंधियारा था

थी उसको इक आस यही
जीवन में इक बार कभी

जब बदल छंट जाएगा
अंधियारा हट जाएगा

उसके उजियारे से सारा
जग उजियारा हो जाएगा

किंतु भाग्य चक्र कुछ ऐसा
जीवन हुआ मरण के जैसा

ग्रहण काल ने ऐसा घेरा
शंकाओं ने डाला डेरा

होने लगी चमक भी धूमिल
जीवन लगने लगा ये बोझिल

किंतु आस रही जीवन में
फूटा अंकुर क्षण भर मन में

जो हार गया मैं इस बादल से
झुलस गया गर दावानल से

कितने जीवन मर जाएंगे
कितने दीपक बुझ जाएंगे

तेज सूर्य सा अंदर भर के
वेग वायु सा संचित करके

उसने बादल को पिघलाया
चमकी श्वेत धवल सी काया

छिपा घने बादल में था जो
चहुंओर चमक रहा था बस वो...
चहुंओर चमक रहा था बस वो...


Monday, May 23, 2022

भीड़तंत्र

भीड़ का न्याय
तराजू से नहीं 
तलवार से होता है
भीड़ बनती है 
भीड़ बनाई जाती है
गढ़ी जाती है
इसे भेड़ बनाकर 
सिर झुका कर 
चलाना ही तंत्र है
भीड़ सवाल नहीं करती
यह शोर करती है 
शोर में दब जाते हैं 
सवाल भी, जवाब भी
यह जब तलवार लेकर
चलती है सड़कों पर
बदहवास लाश सी लगती है
भीड़ सोचती नहीं
बस बढ़ती चली जाती है
अनजान मंजिल की ओर
छद्म से रची हुई दुनिया की तरफ
यह नहीं जानती
इस में कितनी ताकत है
कितनी हिम्मत है
दुनिया बदलने की
लेकिन यह भेड़ बनकर
बढ़ती रहती है लक्ष्यहीन
और इक दिन 
अंधे कुएं में गिरकर 
खामोश हो जाती है
सदा के लिए...

ख़ामोशी

शोर मचाती ख़ामोशी
रोज़ डराती सरगोशी
टूटेगी जाने किस दिन
यह वहशत की मदहोशी
ज़हर बिछी इन सड़कों पर
कब तक यूं चल पाओगे
तलवारों के साए में
किस-किस की जान बचाओगे
इंसां को इंसां न दिखे
छाई कैसी बेहोशी
शोर मचाती ख़ामोशी

Tuesday, May 10, 2022

नफ़रत के सौदागर

सुनो! नफ़रत के सौदागरो
कान खोलकर सुनो 
हवा-पानी में जो घोला है ज़हर तुमने
इक दिन तुम्हारे ही बच्चों का दम घोंटेगा
उस दिन कुछ नहीं होगा तुम्हारे पास 
सिवा इस नफ़रत के, वहशत के 
वह दिन बहुत भयानक होगा
तुम घुटनों के बल झुक कर
रहम की भीख मांग रहे होंगे 
और काल तुम्हें लौटा रहा होगा 
तुम्हारी ही फैलाई नफ़रत 
वह दिन बहुत भयानक होगा 
सुनो! नफ़रत के सौदागरो
कान खोलकर सुनो।।

Monday, December 6, 2021

दुनिया

बड़ी रंगीन है दुनिया मगर इसमें बहुत ग़म है
कहीं पर है उजाला तो कहीं पर रौशनी कम है।

अगर मैं भूल जाऊं रास्ता मंज़िल बता देना
अंधेरी रात काली और उस पर आंख भी नम है।

गिराएंगे तुम्हारा हौसला लेकिन ना तुम रुकना
बता देना कि सीने में तुम्हारे भी बहुत दम है।

कभी होने लगे खुद पर गुमां तो याद ये रखना
गुमां करने को दुनिया में तुम्हारी हैसियत कम है।

फ़सादों में कभी तुम ज़िंदगी बर्बाद मत करना
तज़ुर्बे सीखने को ज़िंदगी भर ज़िंदगी कम है।

Sunday, November 21, 2021

जय हो

विजय विराट
दमका ललाट
है दीप्तमान
हर घाट-घाट
ये नई भोर
गूंजे है शोर
है सिंहनाद
हर ओर-छोर
मन में उमंग
बाजे मृदंग
बिखरे हैं आज
खुशियों के रंग
सीने में दम
पर आंख नम
है लक्ष्य तय
बढ़ते कदम
काली घटा
कोहरा छंटा
जीता वही
जो था डटा
जालिम कटार
धोखे से वार
अब चूर-चूर
सब अहंकार
अब चूर-चूर
सब अहंकार...

Monday, September 13, 2021

उम्मीद

अंधियारे की ओट में छिपकर
आज उजाला पूछ रहा है
रात ये इतनी काली क्यों है
क्यों गहरे हैं इतने साए
सन्नाटों में खौफ़ भरा क्यों
ख़ामोशी बेचैन सी क्यों है
सांसों में क्यों भरी घुटन सी
आंखों में है अजब जलन सी
रंग-बिरंगी इन सड़कों पर
मरघट सी वीरानी क्यों है
क्यों गुम है महफ़िल की रौनक
क्यों साज़ों पर पहरा है
पायल-घुंघरू की खन-खन में
सुरों की हेरा-फेरी क्यों है
भवें तनीं हैं, तना है सीना
ज़ुबां पे तल्ख़ी, नज़र में नफ़रत
मुट्ठी कसी-कसी सी क्यों है
घनी हताशा सबको घेरे
आशा पर किस्मत के फ़ेरे
पाप-पुण्य और झूठ-सत्य में
झूठ का पलड़ा भारी क्यों है
मंदिर-मस्जिद और गिरजों में
दरगाहों और गुरु घरों में
शांत प्रार्थना पूछ रही है
जहन में इतनी वहशत क्यों है
इन पश्नों के अंतर्तम में
रौशन है उम्मीद का सूरज
फ़ेर समय का बहुत प्रबल है
अंधियारे की ओट से उगकर
इक दिन पूछेगा उजियारा
झूठ पे तू शर्मिंदा क्यों है
झूठ पे तू शर्मिंदा क्यों है...

Saturday, July 10, 2021

राह-2

बहुत मुश्किल है
कोई राह चुनना
उससे भी मुश्किल
उस पर चलने की
हिम्मत जुटाना

पहला कदम बढ़ाना
बिना रुके बढ़ते जाना
न थकना, न पलटना
न झुकना, न लड़खड़ाना

अनजान मंज़िल की ओर
होकर बेपरवाह
आवारा झोंके की तरह
बहते चले जाना

ज़माने से बेख़बर
मन के धागे खोलकर
पतंग की तरह
उड़ते ही जाना

आंधियों पर सवार होकर
झुलसाती धूप में तप कर
सहराओं, दरियाओं को पार कर
अनदेखे लक्ष्य में समा जाना

न सुनना, न कहना
मन की ही करना
सपनों की गोद में
धीरे से सिर टिकाना

बादलों पर पांव रखकर
ऊंची छलांग लगाना
तारों की सीढ़ी बनाकर
चांद तक पहुंचना

दूर किसी बर्फीली चोटी पर
अपने रूखे हाथों से
ऊंचे देवदारों को सहलाना
गुनगुना कर लोरी सुनाना

कभी थोड़ा अकड़ कर
नकली रुआब दिखाना
फिर कभी झट से
मान भी जाना

इस सफर से थक कर
बहुत चूर होकर
यादों का सिरहाना लिए
मां के आंचल में सो जाना

बहुत मुश्किल है...
कोई राह चुनना...

हे! तथागत

क्यों मुश्किल है?
हे! तथागत
तुम जैसा जीवन पाना
राज-पाट सब छोड़ा तुमने
सत्य जगत का तब जाना
है संसार में पीड़ा कितनी
कष्ट झेल कर पहचाना
जीवन-मरण से ऊपर उठ कर
भेद ये जीवन का जाना
किंतु, तथागत क्यों मुश्किल है
तुम जैसा जीवन पाना
सत्य-अहिंसा, प्रेम मंत्र को
घर-घर तुमने पहुंचाया
ज्ञान में थी ऐसी शीतलता
जैसे बोधि वृक्ष की छाया
शांति मार्ग पर चलकर तुमने
कितनों को रस्ता दिखलाया
हे! तथागत क्यों मुश्किल है?
तुम जैसा जीवन पाना 
इक विपदा ने खोल दिया अब
इन सारे प्रश्नों का भेद
ज्ञान छिपा है इसमें ऐसा
मानो जैसे चारों वेद
हे! तथागत बहुत ही मुश्किल
तुम जैसा जीवन पाना