एक दोराहे पर है पड़ी ज़िंदगी
चलते-चलते यूं ही रुक गया हूं कहीं
जाने किस बात पर है अड़ी ज़िंदगी
ये मजमे, ये रौनक, ये वीरानगी
ख़त्म कर देगी सब ये घड़ी ज़िंदगी
इम्तिहां जिंदगी के हैं मुश्किल बहुत
दर-ब-दर होके इनसे लड़ी ज़िंदगी
ढंग जीने का ना हमको आया कभी
कशमकश है ये जालिम बड़ी ज़िंदगी
उम्र गुज़री है सारी तक़ब्बुर में पर
मौत के दर पे आकर खड़ी ज़िंदगी
हर सुबह हमें यह मौका देती है कि हम बेहतर सोचें, बेहतर करें और बेहतर बनें।
ReplyDeleteहो सकता है रास्ता आसान न हो, लेकिन आपकी कोशिश ही आपकी सबसे बड़ी ताक़त है।
शुक्रिया भाई
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