Monday, February 22, 2021

मुर्दों का गांव

ये तो अच्छा हुआ कबीरा
जो तुम जहां से चले गए,
कहा था तुमने इस दुनिया को
इक मुर्दों का गांव
ऐसा गांव जहां पर आखिर
इक दिन सबको मरना है
राजा-परजा, बैद और रोगी
पीर-पैगंबर ज़िंदा जोगी
सबको आखिर चलना है
लेकिन वो कुछ और समय था
जिस्म मरा करते थे केवल
रूहें अमर रहा करती थीं
अब ये गांव बदल चुका है
जिस्म नहीं अब यहां पे मरते
उनके बुत बन जाते हैं
जैसे ज़िंदा लाशें हैं
रूहें जिस्म से पहले मरतीं
जिस्म से पहले मरे ज़ुबां
ये मुर्दों का गांव कबीरा
ये मुर्दों का गांव...

Thursday, February 4, 2021

सवाल की मौत

मौत से पहले का मातम
बहुत भयावह है।
मौत अभी दरवाज़े पर है,
झांक रही है अंदर,
सुन रही है रुदन,
ढूंढ़ रही है लाश,
लेकिन लाश लापता है।
चर्चा यह है कि...
इक सवाल की मौत हुई है,
भरी जवानी में।
सवाल भी ऐसा ...
जो अभी पूछा जाना था,
किसी महफ़िल में,
किसी चौपाल में,
किसी अख़बार में।
लेकिन इससे पहले कि ये...
आता किसी की ज़ुबान पर
हो गई अकाल मृत्यु
जवाब से पहले का मातम
बहुत भयावह है।

Thursday, December 24, 2020

डर

आखिर किस बात से डरते हो?
आवाज़ से डरते हो?
ये आवाज़ तो भूखे पेट की है
शोषण के ख़िलाफ़ है
ये आवाज़ तो सच की है
तो क्या सच से डरते हो?
सच तो कभी छिपता नहीं
झुकता नहीं
मुड़ता नहीं
झूठ को बेनकाब करता है
तो क्या बेनकाब होने से डरते हो?
जो बेनकाब हो भी गए, तो क्या?
एक चेहरा ही तो सामने आएगा
अपना ही चेहरा...
तो क्या अपने चेहरे से डरते हो?
अच्छा! मतलब ख़ुद से ही डरते हो!!

मशीन

जब...
पहली बार आई थी मशीन
तो डर गए थे हम
इंसान का क्या होगा?
क्या मिट जाएगा वजूद?
क्या सब गुलाम हो जाएंगे?
क्या सब भूखे मरेंगे?
मशीन ही राज करेगी?
कौंध गए थे सैकड़ों प्रश्न
लेकिन आज...
हमें मशीन से कोई खतरा नहीं
क्योंकि आज...
हम सब बन गए हैं मशीन
अब नहीं कौंधते सैकड़ों प्रश्न।।

Thursday, November 26, 2020

मुंबई हमला (26/11)

बुझ गए चिराग जिनके
उनके दिल से पूछिए
छोड़िए नेता का भाषण
अपने दिल से पूछिए
जब चली थीं गोलियां
तो किसका सीना था वहां
किसकी उजड़ी मांग थी
ये हुक्मरां से पूछिए
कौन ऐसा बाप था
कंधे पे जिसके लाश थी
कैसे रोके थे ये आंसू
मां के दिल से पूछिए
चेहरे पे कितने ज़ख्म थे
हाथों में कितना था लहू
क्या रंग राखी था उस दिन
ये बहन से पूछिए
खामोश थीं किलकारियां
आंगन भी कुछ गुमसुम सा था
गूंजी थीं किसकी सिसकियां
बेटी के दिल से पूछिए।

प्रेम

दिल किसी का न दुखाए
बस वही तो प्रेम है
रोते चेहरे को हंसाए
बस वही तो प्रेम है
तल्खियां बढ़ जाएं जब
दो दिलों के दरमियां
गीत कोई गुनगुनाए
बस वही तो प्रेम है
जब कभी उड़ने लगो तुम
बेवजह आकाश में
पैर धरती पर टिकाए
बस वही तो प्रेम है
ज़िंदगी में भूल कर
हो जाए गर जो भूल तो
भूले को रस्ता दिखाए
बस वही तो प्रेम है
प्रेम में न सरहदें
प्रेम में न बंदिशें
उन्मुक्त सा उड़ता जो जाए
बस वही तो प्रेम है
प्यार की फसलों पे जब
हों ज़हर की बारिशें
गुल मोहब्बत के खिलाए
बस वही तो प्रेम है...

Friday, November 13, 2020

दौर

ये गिरावट का दौर है
भाषा गिर रही
शालीनता नहीं, फूहड़ता का दौर है
संवेदनाएं शून्य हैं
भावुकता नहीं, क्रूरता का दौर है
बौद्धिकता का है पतन
ज्ञान नहीं, अभिमान का दौर है
अभिव्यक्ति खतरे में
बोलने नहीं, डरने का दौर है
सत्य है संकट में
झूठ पर इतराने का दौर है
संस्कार गिर रहे
अदब नहीं, बदज़ुबानी का दौर है
विवेक क्षीण हो रहा
तर्क नहीं, कुतर्क का दौर है
हर दौर गुज़रा है
ये भी गुज़र जाएगा
कहेंगे लोग, इक वो भी दौर था
इक ये भी दौर है