पहले...
उनकी ऊंची-ऊंची आवाज़ें
चुभा करती थीं कानों में
उनकी फूहड़ सी हंसी
मन को भर देती थी क्रोध से
उनके शक्ति प्रदर्शन से
कभी खून खौला करता था
उनकी अज्ञानता पर
शर्म महसूस हुआ करती थी
उनके झूठ पर
चिल्लाने को मन करता था
उनकी नफ़रत भरी बातें
ज़हर बुझे तीर सी लगती थीं
अब...
उनकी ऊंची ऊंची आवाज़ें
जलसों की शान हैं
उनकी फूहड़ हसीं पर
सब हंसते हैं ठहाके लगाकर
उनके शक्ति प्रदर्शन पर
लोग मर-मिटने को तैयार हैं
उनकी अज्ञानता पर भी
तारीफों के पुल बंधते हैं
उनका झूठ अब झूठ नहीं
इतिहास का पुनर्लेखन है
उनकी नफ़रत भरी बातें
अब एकता का मूल मंत्र हैं
मन अंतर्द्वंद्व से जूझ रहा है
क्या सही है, क्या गलत...!!
Saturday, September 28, 2019
अंतर्द्वंद्व: पहले और अब
Thursday, August 15, 2019
राह
इस राह चलूं,
उस राह चलूं
है शोर बहुत
किस राह चलूं
है चाह यही
इस जीवन की
मैं मुश्किल सी
इक राह चलूं
हैं खौफ़ बहुत
इन रस्तों पर
मैं निर्भय
बेपरवाह चलूं
रुकना न पड़े
झुकना न पड़े
दिन रैन बरस
और माह चलूं
मैं छोड़ चलूं
सब खुदगर्ज़ी
मैं छोड़ सभी
फिर चाह चलूं
जिस राह चलूं
उस राह चलूं
फिर और न
कोई राह चलूं
भूख 2
भूख क्या है
अन्न के चंद दानों के लिए छटपटाहट?
यह अभिशाप है
पीढ़ी दर पीढ़ी चलता जा रहा अभिशाप
कभी न ख़त्म होने वाला अभिशाप
हमारी मौक़ापरस्त ज़िंदगी का चेहरा
हमारी लाचारी का स्याह सच
सफेद कपड़ों पर बेशर्मी का पैबंद
जिसका प्रदर्शन कर रहे हैं हम
छाती पर लगे तमगे की तरह
आंकड़ों का पहाड़ बनाने को कर रहे मेहनत
राजनीति के मंच पर अच्छा भाषण है भूख
(दिसंबर 2015)
Tuesday, June 11, 2019
अलीगढ़ दुष्कर्म व हत्याकांड पर...
मौत से हो सामना तो बेबसी ऐसी न दे
है अगर रोना हमारी किस्मतों में लिख दिया
जालिमों की ज़िंदगी में भी हंसी ऐसी न दे
देर से आए 'मसीहा', आबरू न बच सकी
दिल अगर जो दे ख़ुदा तो बेहिसी ऐसी न दे
लाश पर भी लोग करने वो सियासत आ गए
भेड़ियों की आंख में तौबा ख़ुशी ऐसी न दे
Friday, March 1, 2019
युद्ध और कुर्सी
शांति के लिए युद्ध होते हैं
लेकिन कहां आ पाती है शांति युद्ध के बाद भी
लाखों लाशों पर होने वाले रुदन-विलाप भंग कर देते हैं शांति
युद्ध से मिले ज़ख्म छीन लेते हैं नींद भी
बम नहीं पहचान पाते मासूम चेहरे
वे सभी चेहरों को चीथड़ों में बदल देते हैं
लेकिन फिर भी मुस्कुराते हैं कुछ चेहरे
लाशों के ढेर पर और ऊंची हो जाती है उनकी कुर्सी।
गिद्ध और राजनेता
ऊंची डाल पर बैठे गिद्ध
देख रहे हैं चीते और हिरण की लड़ाई
देख रहे हैं चीते का साहस और बल
भर पेट खाने के बाद चीता लौट जाएगा अपनी मांद को
...और गिद्ध हड्डियों में बचा-खुचा मांस नोचेंगे
गर्दन उठा कर इतराएंगे, शिकार पर करेंगे दावा
राजनेताओं सा यह गुण
किसने किससे सीखा?
गिद्धों ने राजनेताओं से या राजनेताओं ने गिद्धों से...