Friday, August 5, 2016

सहर

यूं तो हर रोज़ सहर होती है
यूं तो हर रोज़ सहर होती है
आशाएं बंधती हैं, टूटती हैं
कांधे पर हल रखकर
खेत में पांव रखती हैं उम्मीदें
आकाश से निकलती है एक टुकड़ा धूप
और तभी पानी बन बरस पड़ती हैं बलाएं
यूं तो हर रोज़ सहर होती है...
ज़िंदगी चलती है कुछ कदम
गिरती है, फिर संभलती है
कभी थक के बैठ जाती है
जवाब नहीं मिलते, लेकिन सवाल पूछती है
सदाएं आती हैं माज़ी से, लेकिन टकरा के लौट जाती हैं
यूं तो हर रोज़ सहर होती है...
नींद खुल जाती है अल सुबह
आंखें ढूंढती हैं कुछ, अंगुलियां टटोलती हैं
अनाज के खाली डिब्बे को खंगालती हैं
और फिर फैक्टरियों की घंटियां बज उठती हैं
मशीनों की आवाज़ में दब जाती हैं विरोध की आवाज़ें
यूं तो हर रोज़ सहर होती है...

Friday, July 8, 2016

ख़्वाब-3

तितलियों से ख़्वाब हैं
रंग-बिरंगे से
थोड़े नाज़ुक, थोड़े चंचल
हवा के थपेड़ों से भटक जाते हैं
मगर आंखों में तैरते रहते हैँ...
चटख रंग लिए
कभी उड़ जाते हैं मीलों
खुले गगन में
अपनी पहुंच से भी कहीं दूर
फिर नीला नहीं रह जाता यह आसमान
भर जाता है अनगिनत रंगों से
कभी फूलों पर मंडराते हैं
मोह पाल बैठ जाते हैं ज़िन्दगी का
पर फूलों सी कहां होती है ज़िन्दगी
फिर भी हर फूल का रस पीते हैं ख़्वाब
तितलियों से ख़्वाब
थोड़े नाज़ुक थोड़े चंचल।

लोग

कैसे हैं ये लोग
सूखी शाख़ों पर सजे-धजे लोग
बात-बात पे अंगुलियां उठाते लोग
बेवजह घूरते-डराते लोग
कभी रास्ता रोकते, कभी धकियाते लोग
मचान पे चढ़ कर कंदीलें बुझाते लोग
बरसाती नागफनी जैसे उगे लोग
छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाते लोग
बिना जड़ों के उथले से लोग
फूहड़ से जुमलों पर खिखियाते लोग
हौसला गिराते, साजिशें बुनते लोग
रूढ़ियों से बंधे लोग
कितने कमज़ोर हैं ये लोग
खोखले और बेग़ैरत से लोग...

Thursday, May 26, 2016

बर्फ की दीवारें

काश कि सरहदों पर होतीं बर्फ की दीवारें
जो सियासी बयानों की गर्मी से पिघल जाया करतीं
सरहदों के दोनों ओर फैल जाता इनका ठंडा पानी
फिर कोई फूल खिलता इस पानी से नम हुई मिट्टी में
हर तरफ बिखर जाती जिसकी खुशबू
कंटीली तारों से छिले बिना कितना खूबसूरत और महफूज़ होता वो फूल
काश कि सरहदों पर होतीं बर्फ की दीवारें....

Monday, May 16, 2016

रहगुज़र

ले चलो मुझे ले चलो
उस रहगुज़र पे ले चलो
हाथों में सबके हाथ हों
ऐसे सफ़र पे ले चलो

जहां भूख की दुनिया न हो
जहां लूट के किस्से न हों
गलियों में मिलता हो सुकूं
ऐसी डगर पे ले चलो

मज़हब की दीवारें न हों
और दीन का पर्दा न हो
सजदे से मिलता हो ख़ुदा
मुझे ऐसे दर पे ले चलो

जहां सोच पर पहरा न हो
जहां ख़्वाब पर बंदिश न हो
जहां क़ैद में हों रूढ़ियां
उस कारागर पे ले चलो

जहां कोख में न क़त्ल हों
चेहरे पे न तेज़ाब हो
जहां मुस्कुराएं बेटियां
किसी ऐसे घर पे ले चलो

मज़दूर न मजबूर हों
और खेतिहर खुशहाल हों
जहां शाख़ पे न लाश हो
ऐसे शजर पे ले चलो

पगडंडियों को छोड़ कर
सड़कों पे न भटके कोई
जहां गांव जैसी बात हो
ऐसे शहर पे ले चलो

जहां रात अंधियारी न हो
जहां दोपहर तपती न हो
जहां शाम को सूरज उगे
ऐसी सहर पे ले चलो

ले चलो मुझे ले चलो
उस रहगुज़र पे ले चलो...

Sunday, April 3, 2016

भूख

एक रात जो हुआ भूख से सामना
भूख बोली, आके मेरा हाथ ज़रा थामना
मर रही हूं भूख से और प्यास से बेहाल हूं
बहुत नाउम्मीद हूं और हर तरह निढाल हूं
जिसे देखो-हर कोई बस मुझे है कोसता
मेरी हालत क्या है, मुझसे नहीं कोई पूछता
मैं हुआ हैरान, पूछा-कैसे ये हालत हुई
तुम तो थी हमराह सबकी, अब अकेली क्यों हुई
इतना सुनकर भूख की आंखों में आंसू आ गए
और हम भरपेट सब, ये बात सुन शरमा गए
भूख बोली-मैं तो टुकड़ों के लिए मोहताज हूं
शाहज़ादी मैं गरीबों की मगर बेताज हूं
अनाज कितना सड़ गया, मंडी में अबके साल भी
मेरे हिस्से में मगर आया कमबख्त अकाल ही
कल सुना किसान कितने ख़ुदकुशी कर मर गए
और मरते-मरते सब इल्ज़ाम मुझ पर धर गए
मर गए जो लोग ऐसे, कितने वे खुदगर्ज़ थे
क्या हुआ जो सर पे उनके सैकड़ों के कर्ज़ थे
मातम पे आया नेता और लंबा भाषण पढ़ गया
कह रहा था देश का अब ग्रोथ रेट है बढ़ गया
भुखमरी की बात न करना कभी तुम भूल कर
क्या हुआ जो कायरों ने जान दे दी झूल कर
हम तो अपने देश को अब चांद पर पहुंचाएंगे
मर गए जो याद में उनकी महल बनवाएंगे
भूख से मरता है कोई? भूख तो वरदान है
ये बेचारी तो यूं ही बस मुफ़्त में बदनाम है
भूख की ये बात सुनकर मैं तो बस चकरा गया
और अपनी बेबसी पे सर झुका शरमा गया।

लहू

लहू उबल रहा है,
लहू पिघल रहा है
है कैसी छटपटाहट
मन खुद को छल रहा है

हैं मुट्ठियों में शोले
आंखों में आग सी है
दिल का गुबार है ये
सदियों से पल रहा है

ये कैसी बंदिशें हैं
ये कैसी बेड़ियां हैं
रूहें सुलग रहीं हैं
और जिस्म जल रहा है

ये खेत की मेढ़ों पर
किसने उगाईं सड़कें
गांव हरे-भरे को
शहर निगल रहा है

लाचार से खड़े हैं
आकाश के फ़रिश्ते
किसान का जमीं पे
दम निकल रहा है

सुनहरी धूप को फिर
बादल ने ढक लिया है
उम्मीद का सूरज फिर
पश्चिम में ढल रहा है