Thursday, November 26, 2020

प्रेम

दिल किसी का न दुखाए
बस वही तो प्रेम है
रोते चेहरे को हंसाए
बस वही तो प्रेम है
तल्खियां बढ़ जाएं जब
दो दिलों के दरमियां
गीत कोई गुनगुनाए
बस वही तो प्रेम है
जब कभी उड़ने लगो तुम
बेवजह आकाश में
पैर धरती पर टिकाए
बस वही तो प्रेम है
ज़िंदगी में भूल कर
हो जाए गर जो भूल तो
भूले को रस्ता दिखाए
बस वही तो प्रेम है
प्रेम में न सरहदें
प्रेम में न बंदिशें
उन्मुक्त सा उड़ता जो जाए
बस वही तो प्रेम है
प्यार की फसलों पे जब
हों ज़हर की बारिशें
गुल मोहब्बत के खिलाए
बस वही तो प्रेम है...

Friday, November 13, 2020

दौर

ये गिरावट का दौर है
भाषा गिर रही
शालीनता नहीं, फूहड़ता का दौर है
संवेदनाएं शून्य हैं
भावुकता नहीं, क्रूरता का दौर है
बौद्धिकता का है पतन
ज्ञान नहीं, अभिमान का दौर है
अभिव्यक्ति खतरे में
बोलने नहीं, डरने का दौर है
सत्य है संकट में
झूठ पर इतराने का दौर है
संस्कार गिर रहे
अदब नहीं, बदज़ुबानी का दौर है
विवेक क्षीण हो रहा
तर्क नहीं, कुतर्क का दौर है
हर दौर गुज़रा है
ये भी गुज़र जाएगा
कहेंगे लोग, इक वो भी दौर था
इक ये भी दौर है

मग़रूर

वो शख़्स जो मग़रूर है
वो इक नशे में चूर है
बात करता है फ़लक की
पर जमीं से दूर है
इक रंग में रंगने चला
सिर पे चढ़ा ये फ़ितूर है
ज़ुबां पे नफ़रत का ज़हर
दुनिया कहे ये शऊर है
झूठ पर वो झूठ बोले
सच यही मशहूर है
हाथ डूबे हैं लहू में
कुछ न कुछ तो कसूर है
न ख़ुदा का खौफ़ खाए
इतना उसमें ग़ुरूर है
वो शख़्स जो मग़रूर है...

Thursday, September 24, 2020

एक, दो, तीन

एक...
एक जैसा सोचो
एक जैसा पहनो
एक जैसा खाओ-पियो
एक में ही सुरक्षा है
इसलिए एक हो जाओ!!
दो...
दो से द्वेष है
दो से दोष है
दो से द्रोह है
दो से एक को ख़तरा है
इसलिए एक हो जाओ!!
तीन...
तीन में सृजन है
तीन में चिंतन है
तीन में मंथन है
मंथन में घर्षण है
घर्षण में टकराव है
इसलिए एक हो जाओ!!

वर्जनाओं के उस पार...

वर्जनाएं तोड़ डालो
इनके आगे साधना है
जीवन है, दर्शन है

गर्जनाएं रौंद डालो
इनके आगे मौन है
ज्ञान है, सम्मान है

तर्जनाएं काट डालो
इनके आगे प्रेम है
भक्ति है, आसक्ति है

सर्जनाएं बांट डालो
इनके आगे कल्पना है
संसार है, उद्धार है

Friday, September 11, 2020

पाश

पाश! तुमने कहा था...
सबसे ख़तरनाक होता है...
सपनों का मर जाना
मुर्दा शांति से भर जाना
तुम्हारी वो बातें आज भी गूंजती हैं
मुर्दा शांति को भंग करती हैं
वो मुर्दा जिस्म आज भी टहलते हैं
घर से निकलते हैं सुबह...
और शाम को लौट आते हैं
बिना कोई सवाल किए
बस हथौड़ा पीटते हैं
यहां सब खुश हैं पाश
काश तुम भी जिंदा होते
सपनों को ज़िंदा रखते
बड़े बेवक़्त चले गए।।

Friday, June 12, 2020

सलाम

सलाम कर, सलाम कर
निज़ाम को, सलाम कर
सुबह कर शाम कर
बस यही काम कर
निज़ाम को सलाम कर

मत कोई सवाल कर
मत कोई बवाल कर
लाश बनके देख सब
आंख को संभाल कर
शातिरों की भीड़ में
शातिरों सा काम कर
निज़ाम को सलाम कर

ये है तुम्हारा हक नहीं
कर सको जो शक कहीं
सब तो ठीक है यहां
शक की है जगह कहां
चुपचाप अपना काम कर
निज़ाम को सलाम कर

बेवजह न बोल तू
यूं ज़हर न घोल तू
क्या मिलेगा पूछ कर
जवाब खुद ही बोल तू
ज़िंदा है अभी तलक
बस इसका एहतराम कर
निज़ाम को सलाम कर

मुख़ालफ़त की सोच मत
ज़ख्म कोई नोच मत
रेंगने की बात कर
दौड़ने की सोच मत
जिस्म अपना मोड़ कर
रूह को ग़ुलाम कर
निज़ाम को सलाम कर

जाहिलों का दौर है
शोर चारों ओर है
जिससे खौफ़ खा रहा
उसके दिल में चोर है
बोलने सभी लगें
कुछ ऐसा इंतज़ाम कर
सलाम कर, सलाम कर...