Thursday, September 24, 2020

वर्जनाओं के उस पार...

वर्जनाएं तोड़ डालो
इनके आगे साधना है
जीवन है, दर्शन है

गर्जनाएं रौंद डालो
इनके आगे मौन है
ज्ञान है, सम्मान है

तर्जनाएं काट डालो
इनके आगे प्रेम है
भक्ति है, आसक्ति है

सर्जनाएं बांट डालो
इनके आगे कल्पना है
संसार है, उद्धार है

Friday, September 11, 2020

पाश

पाश! तुमने कहा था...
सबसे ख़तरनाक होता है...
सपनों का मर जाना
मुर्दा शांति से भर जाना
तुम्हारी वो बातें आज भी गूंजती हैं
मुर्दा शांति को भंग करती हैं
वो मुर्दा जिस्म आज भी टहलते हैं
घर से निकलते हैं सुबह...
और शाम को लौट आते हैं
बिना कोई सवाल किए
बस हथौड़ा पीटते हैं
यहां सब खुश हैं पाश
काश तुम भी जिंदा होते
सपनों को ज़िंदा रखते
बड़े बेवक़्त चले गए।।

Friday, June 12, 2020

सलाम

सलाम कर, सलाम कर
निज़ाम को, सलाम कर
सुबह कर शाम कर
बस यही काम कर
निज़ाम को सलाम कर

मत कोई सवाल कर
मत कोई बवाल कर
लाश बनके देख सब
आंख को संभाल कर
शातिरों की भीड़ में
शातिरों सा काम कर
निज़ाम को सलाम कर

ये है तुम्हारा हक नहीं
कर सको जो शक कहीं
सब तो ठीक है यहां
शक की है जगह कहां
चुपचाप अपना काम कर
निज़ाम को सलाम कर

बेवजह न बोल तू
यूं ज़हर न घोल तू
क्या मिलेगा पूछ कर
जवाब खुद ही बोल तू
ज़िंदा है अभी तलक
बस इसका एहतराम कर
निज़ाम को सलाम कर

मुख़ालफ़त की सोच मत
ज़ख्म कोई नोच मत
रेंगने की बात कर
दौड़ने की सोच मत
जिस्म अपना मोड़ कर
रूह को ग़ुलाम कर
निज़ाम को सलाम कर

जाहिलों का दौर है
शोर चारों ओर है
जिससे खौफ़ खा रहा
उसके दिल में चोर है
बोलने सभी लगें
कुछ ऐसा इंतज़ाम कर
सलाम कर, सलाम कर...

Thursday, May 28, 2020

मज़दूर का दर्द

ये दर्द नया नहीं
सदियों पहले भी था
और आज भी है
सिर पर गठरी उठाए
पीठ पर बच्चा लटकाए
ये तस्वीर
नई नहीं
सदियों पहले भी थी
जब फैक्ट्रियां नहीं थीं
ये अधनंगे बदन
तब भी थे
ये गुमनाम मौतें
ये बिलखती रूहें
तब भी थीं
ये हिक़ारत भरी नज़रें
ये दमन की लालसा
ये आबरू के सौदे
ये पर्दापोशी के मजमे
तब भी थे
कौड़ी कौड़ी को
लाचार हाथ
जुल्म सहते जिस्म
तब भी थे
भूख की तड़प
और रोटी की सियासत
तब भी थी
कबीलों से राजशाही
राजशाही से ग़ुलामी
और ग़ुलामी से लोकशाही
इस लंबे सफ़र में
दर्द की इंतहा
तब भी थी
और आज भी है
...लेकिन ये उस वक़्त नहीं था
जब हम सभ्य नहीं थे
अफसोस!! हम सभ्य क्यों हुए?

उड़ान

उसने सबसे पहले
दाहिने पंख पर कील ठोंकी
लेकिन वो उड़ गया
उसने बाएं पंख पर कील ठोंकी
लेकिन वो फिर उड़ गया
उसने दाहिना पंख काट दिया
अब वो फड़फड़ाने लगा
उसने बायां पंख भी काट दिया
अब वो लड़खड़ा कर चलने लगा
कुछ देर चला
और फिर गिर गया
अब उसने पंखों पर मरहम लगाया
सारी कायनात को दिखाया
अपनी दयालुता से सबको मोह लिया
उसका जयघोष होने लगा
फिर उसने...
खुले आसमान में उड़ने वाले को
पंजों पर चलना सिखाया
अपने दरबार में बिठाया
और एलान किया...
इक दिन यूं ही तुम्हें
उड़ना भी सिखा दूंगा
दरबार तालियों से गूंज उठा!!

Friday, May 8, 2020

ख़ानाबदोशी

2122 2122 2122 22
इस तरह आंखें चुराने की ज़रूरत क्या है
झूठ का परदा चढ़ाने की ज़रूरत क्या है

हर तरफ ख़ानाबदोशी है सितमगर अब तो
दर-ब-दर मजमा लगाने की ज़रूरत क्या है

चोर कोई है छिपा दिल में अगर तो कह दे
बेवजह दिल को दुखाने की ज़रूरत क्या है

बस्तियां होने लगी ख़ाली कि डर लगता है
अब चराग़ों को जलाने की ज़रूरत क्या है

हैं अगर दोस्त ज़माने में रक़ीबों जैसे
पास दुश्मन को बिठाने की ज़रूरत क्या है

आख़िरी होगा सफ़र मालूम तो था सबको
बात ये दिल से लगाने की ज़रूरत क्या है

Wednesday, April 29, 2020

इंतज़ार

(अभिनेता इरफान खान के निधन पर। उनके आखिरी शब्द थे "मेरा इंतज़ार करना")

मेरा इंतज़ार करना
मैं लौटूंगा इक दिन
इन हवाओं में घुलकर
तुमसे बातें करूंगा
फ़िल्म के किसी डायलॉग की तरह
मैं पूछूंगा तुमसे...
मेरे जाने के बाद
कितना हंसे तुम
कितना मुस्कुराए
कितना खिलखिलाए
तुम रोने की बात मत करना
मैं पूछूंगा तुमसे...
कैसे लड़े अपने अंतर्द्वंद्व से
कैसे भिड़े हालात से
कैसे अड़े मुश्किलों से
तुम हारने की बात मत करना
मैं सुनूंगा तुमसे...
कुछ किस्से
कब हुई थी तुम्हें पहली मोहब्बत
कब बारिश में भीगे थे आखिरी बार
कब ऊंची आवाज़ में गाया था गाना
तुम विरह की बात मत करना
मैं लड़ूंगा तुमसे...
क्यों उलझे रहते हो इन झमेलों में
क्यों सिर झुका के चलते हो
क्यों ज़िंदगी को बोझ बना रखा है
तुम बहानों की बात मत करना
खुलकर उड़ना परिंदों की तरह
खुलकर बहना झरनों की तरह
खुलकर लुटाना मनमर्ज़ियां
सीधा सा जवाब देना मेरे सवालों का
मेरा इंतज़ार करना।