Wednesday, April 29, 2020

इंतज़ार

(अभिनेता इरफान खान के निधन पर। उनके आखिरी शब्द थे "मेरा इंतज़ार करना")

मेरा इंतज़ार करना
मैं लौटूंगा इक दिन
इन हवाओं में घुलकर
तुमसे बातें करूंगा
फ़िल्म के किसी डायलॉग की तरह
मैं पूछूंगा तुमसे...
मेरे जाने के बाद
कितना हंसे तुम
कितना मुस्कुराए
कितना खिलखिलाए
तुम रोने की बात मत करना
मैं पूछूंगा तुमसे...
कैसे लड़े अपने अंतर्द्वंद्व से
कैसे भिड़े हालात से
कैसे अड़े मुश्किलों से
तुम हारने की बात मत करना
मैं सुनूंगा तुमसे...
कुछ किस्से
कब हुई थी तुम्हें पहली मोहब्बत
कब बारिश में भीगे थे आखिरी बार
कब ऊंची आवाज़ में गाया था गाना
तुम विरह की बात मत करना
मैं लड़ूंगा तुमसे...
क्यों उलझे रहते हो इन झमेलों में
क्यों सिर झुका के चलते हो
क्यों ज़िंदगी को बोझ बना रखा है
तुम बहानों की बात मत करना
खुलकर उड़ना परिंदों की तरह
खुलकर बहना झरनों की तरह
खुलकर लुटाना मनमर्ज़ियां
सीधा सा जवाब देना मेरे सवालों का
मेरा इंतज़ार करना।

Sunday, March 29, 2020

युद्ध और शिलालेख

सैनिकों के दम पर ही लड़े जाते हैं युद्ध
मारे भी सैनिक ही जाते हैं, जीतते भी सैनिक ही हैं
मक्कार सेनापति सैनिकों को बनाते हैं ढाल
वीर सेनापति बन जाते हैं सैनिकों की ढाल
मक्कार राजा हाथियों पर सवार होकर लेते हैं युद्ध का आनंद
वीर राजा हाथियों से उतरकर रणभूमि में दिखाते हैं पराक्रम
मक्कार राजा सैनिकों की कब्र पर लिखवाते हैं अपनी प्रशंसा के शिलालेख
वीर राजा बलिदान देकर खुद ही बन जाते हैं शिलालेख...

Wednesday, March 4, 2020

मौत

मौत को रखा करो आंखों के सामने
इसे रोज़ महसूस किया करो
इससे डरो नहीं, बात किया करो
सैकड़ों सबक समेटे हुए है मौत
हज़ारों अनुभव हैं इसके पास
इनसे सीखा करो कुछ
जब भी कभी अहंकार से भर जाए मन
ख़ुद को ख़ुदा महसूस करने लगो
पांव जब ज़मीन पर न लगें
बेवजह हवा में उड़ने लगो
गर्दन और आंखें झुकने से इन्कार करें
तो मौत से बात किया करो, इससे डरो नहीं...

Wednesday, February 5, 2020

इम्तिहां

आज ख़ामोश सी है ज़ुबां क्यों मगर
बढ़ रहे फासले दरमियां क्यों मगर

ये शजर छांव देते नहीं आजकल
धूप है ले रही इम्तिहां क्यों मगर

इक चमन था बनाया बड़े शौक से
उस चमन का नहीं बागबां क्यों मगर

नाव मझधार में है फंसी फिर कहीं
है हवा से ख़फा बादबां क्यों मगर

राज़ थे राज़ हैं राज़ ही रह गए
राज़ ही हो गए राज़दां क्यों मगर

आग ही आग है नफरतों की यहां
हर तरफ है यहां बस धुआं क्यों मगर

थे निगहबान जो सरज़मीं के कभी
आज बनते नहीं पासबां क्यों मगर

Sunday, January 12, 2020

अकेला

भीड़ बनकर मत जियो तुम
भीड़ बनकर मत मरो तुम
आए जीवन में अकेले
छोड़कर सारे झमेले
अब अकेले ही चलो तुम

मत करो परवाह सबकी
फूल सी गर राह उनकी
तुम चुनो कांटों का रस्ता
मुश्किलों से हो वाबस्ता
अब अकेले ही चलो तुम

मोड़ आएंगे अंधेरे
शत्रु चारों ओर घेरे
इन सभी से पार पाकर
आस की इक लौ जलाकर
अब अकेले ही चलो तुम

सोच को आजाद रखो
ऊंची हर परवाज़ रखो
बेड़ियों को काट डालो
रूढ़ियों को छांट डालो
अब अकेले ही चलो तुम

भीड़ तो गुमराह करती
जिंदगी आगाह करती
लो सबक कुछ जिंदगी से
राह खोजो बंदगी से
अब अकेले ही चलो तुम

अंगुलियों का नाच छोड़ो
बीते कल की बात छोड़ो
है बहुत लंबा सफर यह
है बहुत मुश्किल डगर यह
अब अकेले ही चलो तुम...

Thursday, January 2, 2020

आवाज़ें

कितनी आवाज़ दबाओगे
कितनी परवाज़ दबाओगे
हम और ज़ोर से बोलेंगे
तुम जितना हमें डराओगे
कितनी आवाज़...

जब-जब भी डराया है तुमने
जब-जब भी दबाया है तुमने
हैं सबक तुम्हें कुछ याद नहीं
आखिर में मुंह की खाओगे
कितनी आवाज़...

मंदिर मस्जिद में बांट दिया
सदियों का रिश्ता काट दिया
अब राम और अल्लाह करते हो
ऊपर क्या मुंह दिखलाओगे
कितनी आवाज़...

जाहिल सी बातें करते हो
बस लट्ठ घुमाते चलते हो
जां हाथ पे लेकर निकले हैं
तुम क्या हम से टकराओगे
कितनी आवाज़...

गुलशन ये बना कुर्बानी से
रंगों से भरी जवानी से
मिट्टी में मिला है खूं सबका
यह रंग मिटा ना पाओगे
कितनी आवाज़...


Wednesday, November 27, 2019

तवारीख़

तवारीख़


काश कि बदल पाती ये तवारीख़
तो मैं बदल देता नफ़रतों के ग़ुबार का रुख
कि जिन्होंने तबाह कर दी तमाम नस्लें
कि जिन्होंने बारूद भर दिया आंखों में
और छीन लिए ख़ुशनुमा सपने
कि जिन्होंने शमशीरें थमा दी हाथों में
और छीन लिया पत्थरों में जान फूंकने का हुनर
कि जिन्होंने जहर उड़ेल दिया हलक में 
और छीन लिए फागुन के मीठे गीत
कि जिन्होंने कानों में भर दिए भड़कते शोले
और छीन ली टेकरी पर बजती बांसुरी की धुन

काश कि बदल पाती ये तवारीख़
तो मैं समंदर में डुबो देता तमाम रूढ़ियों को
कि जिन्होंने दोज़ख़ बना दी यह ज़िन्दगी
कि जिन्होंने शर्मसार कर दिया इंसानी रूह को
और शैतान आबाद हो गए बेहयाई से
कि जिन्होंने बेड़ियों में जकड़ ली कतरा-कतरा सांस
और महल-अटारियों में गहरी नींद सो गए
कि जिन्होंने पत्थरों पे लिख दी कायदों की इबारतें
और स्याहपोश नक़ाब पहन न्याय का ढोंग किया
कि जिन्होंने मजहब के नाम पर फ़साद कराए
और पांव तले रौंद डाले सभी धर्मग्रंथ

काश की बदल पाती ये तवारीख़
तो मैं नामोनिशां मिटा देता सरहदों का
कि जिन्होंने न जाने कितने हिस्सों में बांट दी दुनिया
कि जिन्होंने अंबार लगा दिए लाशों के
और खड़े कर दिए दंभ के शौर्य स्तंभ
कि जिन्होंने तार-तार कर दिए इंसानी रिश्ते
और जिस्म में भर दी जानवरों सी वहशत
कि जिन्होंने हर पहचान मिटा दी
और दर-बदर लावारिस बना दिया
कि जिन्होंने छीन लिया मासूमों का बचपन
और नस्लों की जवानी तबाह कर दी

काश कि बदल पाती तवारीख़
तो मैं ये सब बदल देता....