Thursday, August 23, 2018

श्रद्धांजलि

श्रद्धा से झुके शांत सिर
अपलक निहारती नम आंखें
जड़ हो चुकी चंचल जीह्वा
एक दिव्य पुरुष के अवसान पर
किंतु हिलोरें लेता क्षुद्र मन
अट्टहास करती निष्ठुर आत्मा
दृश्य जैसे अचानक बदल गया
शांत सिर में कौंध गए अनगिनत विचार
नम आंखों में दिखी सिंहासन की चमक
जड़ हुई जिह्वा से फूटे भेड़ियों के स्वर
स्थिर शरीर ने दिखाया बाहुबल
जयघोष के साथ हुआ राज्याभिषेक
"श्रद्धासुमन" राजा पर न्योछावर हुए
श्रद्धांजलि सभा संपन्न हुई।।

Saturday, July 28, 2018

पश्चाताप

तेरा कोई पश्चाताप नहीं
लाशों के ढेर पर खड़ा करबद्ध
क्षमा मांग रहा रोती रूहों से
क्योंकि अब नींद नहीं आती
तेरा कोई अधिकार नहीं
तेरा कोई पश्चाताप नहीं
तेरे अट्टहास के सामने
मंद पड़ गया हर रुदन
मंद पड़ गई हर चीत्कार
भुजाओं की ताक़त के नशे में चूर
अब चूर चूर हुआ तेरा गुरूर
तेरा कोई सत्कार नहीं
तेरा कोई पश्चाताप नहीं

मुद्दत

हुई मुद्दत कि आंखों ने वो बरसातें नहीं देखीं
भीगी सुबहें नहीं देखीं, गीली रातें नहीं देखीं
किताबों के नशे से चूर हो जाती थीं जब आंखें
ऐसी नींदें नहीं देखीं, ऐसी रातें नहीं देखीं
आंगन में बहा करती कभी जो नाव पत्तों की
ऐसा बचपन नहीं देखा, ऐसी बातें नहीं देखीं
पढ़ाई के बहाने से सजा करती थी जो महफ़िल
ऐसे मजमे नहीं देखे, मुलाकातें नहीं देखीं

Friday, July 27, 2018

गुनाह

मुझको मेरा गुनाह बता
हर सुबह खौफ़ भरी
हर रात भयानक स्याह
दिन की रोशनी में तपिश
शाम बदरंग, धूसर जैसी
रिश्तों का क़त्ल रोज़ देखता
अपनी नन्हीं सी आंखों से
ज़िंदगी कैद थी जैसे हाथों में
कंचों से भरी मुट्ठी भींच लेता
और वो बिखर जाते लम्हों की तरह
समेटने की कोशिश में अक्सर
छिल जाती कुहनियां
अब भी हैं गहरे निशां
मुझको मेरा गुनाह बता

गहरे सायों में चलता छिप छिप कर
तुझसे मांगा करता क़तरा क़तरा धूप
मां की रुआंसी आंखों में
सुनाई देते क्रूर प्रहसन
पिता के निश्छल समर्पण पर
वो बिखेरते कुटिल मुस्कान
बेदम पिंडलियों पर बढ़ता बोझ
और रास्ते पर भट्ठी की गर्म राख
झुलसे हुए पांवों में
अब भी हैं निशां
मुझको मेरा गुनाह बता।


Wednesday, June 6, 2018

सवाल

तुझसे ऐ ज़िन्दगी सवाल क्यों है
हर बात पे इतना बवाल क्यों है

ज़िन्दगी को खोकर फिर पाई ज़िन्दगी
फिर ज़िन्दगी पे इतना मलाल क्यों है

मुकाम शोहरतों के हसीं बहुत हैं यारो
पर ज़िन्दगी में इतना ज़वाल क्यों है

आंखों पे कफ़न होगा, मिट्टी में जिस्म होगा
फिर चेहरे पे रंग-ए-जमाल क्यों है

मोहब्बतों की दुनिया कितनी दिलकशी है
नफरतों का इसमें ख़्याल क्यों है

सहरा-ओ-समंदर में इक जैसी तिश्नगी है
ये ज़िन्दगी भी इतनी कमाल क्यों है

Saturday, May 26, 2018

मुलाकात

सोचा था होगी बात तो कुछ बात करेंगे
हो यादगार ऐसी मुलाकात करेंगे
इस डर से मगर हम न कोई बात कर सके
बिगड़ी जो अगर बात तो क्या बात करेंगे

नज़रों के इशारों में ही वो दिल को पढ़ गए
पलभर में कई नश्तर सीने में गढ़ गए
समंदर कोई यादों का आंखों में उमड़ आया
बिना खोले ही वो खत का मेरे मजमून पढ़ गए

शिकवे-शिकायतों का न मौका कोई मिला
दिल ही में रह गया जो मेरे दिल का था  गिला
धीरे से मेरी पलकों ने कुछ उनसे बात की
ऐसा था इक सवाल कि जवाब न मिला

मुद्दतों मिले मगर असर न कुछ हुआ
अजीब शय है दिल जो किसी का नहीं हुआ
वो शाम मुलाकात की नासूर बन गई
और इस तरह किस्सा-ए-मोहब्बत ख़त्म हुआ

Wednesday, May 23, 2018

पैरहन

झुलसी हुई यादों का अनमोल खज़ाना है
बाज़ार-ए-मोहब्बत में लुटने से बचाना है

बर्बाद-ए-गुलिस्तां में लौटेंगी बहारें भी
आबाद उसे करने को फूल खिलाना है

दरिया-ए-मोहब्बत में अश्कों की रवानी है
इक पल को जो रोना है, इक पल को हंसाना है

जिस पैरहन के सदके तुमको गुमां बहुत है
उस पैरहन को इक दिन यूं छोड़ के जाना है

महलों में सो रहे हैं मौकापरस्त सारे
मेहनतकशों का कोई न ठौर ठिकाना है

नफरत भरी है दिल में, आंखों में आग सी है
चेहरे की मुस्कराहट बस एक बहाना है

ये खुशामदी की बातें ये दौर-ए-बुतपरस्ती
इंसान की फ़ितरत से वाकिफ़ ये ज़माना है