Saturday, January 28, 2017

शब-ए-ग़म

शब-ए-ग़म भी आख़िर गुज़र जाएगी
हर तरफ रोशनी ही नज़र आएगी

बादबां कश्तियों के न मोड़ो इधर
ये इधर की हवा है उधर जाएगी

बाद मुद्दत चमन में चली है हवा
मस्त होकर न जाने किधर जाएगी

उड़ रही है जो चिड़िया न पकड़ो उसे
बांध पिंजरे में डाला तो मर जाएगी

मंज़िलें हौसलों की ही मोहताज हैं
ज़िंदगी हौसलों से संवर जाएगी

मौज सागर की है, इससे डरते नहीं
ये साहिल पे आकर बिखर जाएगी

बेटियों सी खफ़ा है ख़ुशी आजकल
बेटियों सा मनाने पे घर आएगी

Saturday, December 24, 2016

बात

बात से बनती नहीं बातें, मगर कुछ बात कर
चुप रहेगा कब तलक, अब तोड़ चुप्पी बात कर

है अंधेरा रास्तों में, खो न जाना तू कहीं
रात अंधियारी सही, तू रोशनी की बात कर

राह में तूफां खड़े हैं, खौफ़ दिल में भर रहे
मुश्किलों की है घड़ी, तू हौसलों की बात कर

ये ज़माना रोकता है, पर न तू रुकना कभी
वो डुबोएंगे तुझे, तू साहिलों की बात कर

है ज़मीं सूखी हुई, तू जा कहीँ फसलें उगा
बारिशें चुप हैं, मगर तू बादलों की बात कर

मंज़िलें मुश्किल बड़ी हैं, पर न घबराना कभी
रास्तों पर चल अकेला, काफिलों की बात कर

ये मकां ऊंचे बहुत हैं, ये कभी झुकते नहीं
फाज़िलों की वो सुनें, तू जाहिलों की बात कर

Thursday, October 20, 2016

रास्ते

रास्ते खो गए हैं राहों में
मंज़िलें ना मिलेंगी अब हमको
कोई उम्मीद क्यों भला छोड़ें..

ज़िंदगी दे रही है आवाज़ें
आओ सुन लें कि कोई बात बने
कोई उलझन सुलझ सके शायद..

आईने टूट गए हैं घर के
अपना चेहरा भी नहीं दिखता यहां
एक साथी था वो भी रूठ गया.
.

Thursday, September 8, 2016

ब्लू शर्ट

उसे ब्लू कलर बहुत पसंद था
हमेशा कहती थी
ब्लू शर्ट पहना करो
तुम पर खूब फबती है
और मैं?
मैं आजिज़ आ चुका था अब ब्लू कलर से
अच्छा-खासा कलेक्शन हो गया था मेरे पास
इक दिन अचानक...
कोई चार साल बाद
उसका मैसेज आया मोबाइल पर
तुम्हारे ही शहर में हूं..
मिलने भी नहीं आओगे?
और मैं?
मैं फिर अलमारी में पड़ी
एक पुरानी ब्लू कलर की शर्ट पहन कर
उससे मिलने चल दिया....

Sunday, September 4, 2016

सन्नाटे

मुर्दा घरों के सन्नाटे को शांति नहीं कहते
अंदर ही अंदर घुट जाने को संयम नहीं कहते
चट्टानों से फूट कर बहना पड़ता है..
जमे हुए पानी को झरना नहीं कहते

लिबास ओढ़कर नाचतीं लाशें प्रतिकार नहीं करतीं
चुप तो मीठी मौत है, चुप चीत्कार नहीं करती
पहाड़ों के आगे गला फाड़ चिल्लाना पड़ता है..
ठंडी आहें तो बस आहें हैं, इन्हें आग नहीं कहते

ये जो बारूद फटता है न, इसमें खुशबू नहीं होती
गंध होती है तेज सी, जो पसंद नहीं होती
महक जाने के लिए तो फूल बनना पड़ता है..
कीकर के दरख्तों को गुलमोहर नहीं कहते

बदहवास सड़कें कभी थकती नहीं हैं
आड़ी-तिरछी पगडंडियां कभी टूटती नहीं हैं
बस ताउम्र चलते ही रहना पड़ता है..
बेजान खड़े बुतों को इन्सान नहीं कहते।।

हमारे अंदर का अल्बर्ट पिंटो

क्रोध यूं तो कोई ठीक बात नहीं
गांधी और कृष्ण के देश में तो बिल्कुल भी नहीं
तो क्या बेहतर है?
विष पीकर नीलकंठ हो जाना?
लेकिन क्रोध तो गांधी और कृष्ण का भी दब न सका
शिव का भी नहीं
क्रोध को पी जाने से बेहतर है
इसे दिशा दे जाना
अल्बर्ट पिंटो बन जाने के लिए...

Friday, August 5, 2016

सहर

यूं तो हर रोज़ सहर होती है
यूं तो हर रोज़ सहर होती है
आशाएं बंधती हैं, टूटती हैं
कांधे पर हल रखकर
खेत में पांव रखती हैं उम्मीदें
आकाश से निकलती है एक टुकड़ा धूप
और तभी पानी बन बरस पड़ती हैं बलाएं
यूं तो हर रोज़ सहर होती है...
ज़िंदगी चलती है कुछ कदम
गिरती है, फिर संभलती है
कभी थक के बैठ जाती है
जवाब नहीं मिलते, लेकिन सवाल पूछती है
सदाएं आती हैं माज़ी से, लेकिन टकरा के लौट जाती हैं
यूं तो हर रोज़ सहर होती है...
नींद खुल जाती है अल सुबह
आंखें ढूंढती हैं कुछ, अंगुलियां टटोलती हैं
अनाज के खाली डिब्बे को खंगालती हैं
और फिर फैक्टरियों की घंटियां बज उठती हैं
मशीनों की आवाज़ में दब जाती हैं विरोध की आवाज़ें
यूं तो हर रोज़ सहर होती है...