Sunday, September 4, 2016

सन्नाटे

मुर्दा घरों के सन्नाटे को शांति नहीं कहते
अंदर ही अंदर घुट जाने को संयम नहीं कहते
चट्टानों से फूट कर बहना पड़ता है..
जमे हुए पानी को झरना नहीं कहते

लिबास ओढ़कर नाचतीं लाशें प्रतिकार नहीं करतीं
चुप तो मीठी मौत है, चुप चीत्कार नहीं करती
पहाड़ों के आगे गला फाड़ चिल्लाना पड़ता है..
ठंडी आहें तो बस आहें हैं, इन्हें आग नहीं कहते

ये जो बारूद फटता है न, इसमें खुशबू नहीं होती
गंध होती है तेज सी, जो पसंद नहीं होती
महक जाने के लिए तो फूल बनना पड़ता है..
कीकर के दरख्तों को गुलमोहर नहीं कहते

बदहवास सड़कें कभी थकती नहीं हैं
आड़ी-तिरछी पगडंडियां कभी टूटती नहीं हैं
बस ताउम्र चलते ही रहना पड़ता है..
बेजान खड़े बुतों को इन्सान नहीं कहते।।

हमारे अंदर का अल्बर्ट पिंटो

क्रोध यूं तो कोई ठीक बात नहीं
गांधी और कृष्ण के देश में तो बिल्कुल भी नहीं
तो क्या बेहतर है?
विष पीकर नीलकंठ हो जाना?
लेकिन क्रोध तो गांधी और कृष्ण का भी दब न सका
शिव का भी नहीं
क्रोध को पी जाने से बेहतर है
इसे दिशा दे जाना
अल्बर्ट पिंटो बन जाने के लिए...

Friday, August 5, 2016

सहर

यूं तो हर रोज़ सहर होती है
यूं तो हर रोज़ सहर होती है
आशाएं बंधती हैं, टूटती हैं
कांधे पर हल रखकर
खेत में पांव रखती हैं उम्मीदें
आकाश से निकलती है एक टुकड़ा धूप
और तभी पानी बन बरस पड़ती हैं बलाएं
यूं तो हर रोज़ सहर होती है...
ज़िंदगी चलती है कुछ कदम
गिरती है, फिर संभलती है
कभी थक के बैठ जाती है
जवाब नहीं मिलते, लेकिन सवाल पूछती है
सदाएं आती हैं माज़ी से, लेकिन टकरा के लौट जाती हैं
यूं तो हर रोज़ सहर होती है...
नींद खुल जाती है अल सुबह
आंखें ढूंढती हैं कुछ, अंगुलियां टटोलती हैं
अनाज के खाली डिब्बे को खंगालती हैं
और फिर फैक्टरियों की घंटियां बज उठती हैं
मशीनों की आवाज़ में दब जाती हैं विरोध की आवाज़ें
यूं तो हर रोज़ सहर होती है...

Friday, July 8, 2016

ख़्वाब-3

तितलियों से ख़्वाब हैं
रंग-बिरंगे से
थोड़े नाज़ुक, थोड़े चंचल
हवा के थपेड़ों से भटक जाते हैं
मगर आंखों में तैरते रहते हैँ...
चटख रंग लिए
कभी उड़ जाते हैं मीलों
खुले गगन में
अपनी पहुंच से भी कहीं दूर
फिर नीला नहीं रह जाता यह आसमान
भर जाता है अनगिनत रंगों से
कभी फूलों पर मंडराते हैं
मोह पाल बैठ जाते हैं ज़िन्दगी का
पर फूलों सी कहां होती है ज़िन्दगी
फिर भी हर फूल का रस पीते हैं ख़्वाब
तितलियों से ख़्वाब
थोड़े नाज़ुक थोड़े चंचल।

लोग

कैसे हैं ये लोग
सूखी शाख़ों पर सजे-धजे लोग
बात-बात पे अंगुलियां उठाते लोग
बेवजह घूरते-डराते लोग
कभी रास्ता रोकते, कभी धकियाते लोग
मचान पे चढ़ कर कंदीलें बुझाते लोग
बरसाती नागफनी जैसे उगे लोग
छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाते लोग
बिना जड़ों के उथले से लोग
फूहड़ से जुमलों पर खिखियाते लोग
हौसला गिराते, साजिशें बुनते लोग
रूढ़ियों से बंधे लोग
कितने कमज़ोर हैं ये लोग
खोखले और बेग़ैरत से लोग...

Thursday, May 26, 2016

बर्फ की दीवारें

काश कि सरहदों पर होतीं बर्फ की दीवारें
जो सियासी बयानों की गर्मी से पिघल जाया करतीं
सरहदों के दोनों ओर फैल जाता इनका ठंडा पानी
फिर कोई फूल खिलता इस पानी से नम हुई मिट्टी में
हर तरफ बिखर जाती जिसकी खुशबू
कंटीली तारों से छिले बिना कितना खूबसूरत और महफूज़ होता वो फूल
काश कि सरहदों पर होतीं बर्फ की दीवारें....

Monday, May 16, 2016

रहगुज़र

ले चलो मुझे ले चलो
उस रहगुज़र पे ले चलो
हाथों में सबके हाथ हों
ऐसे सफ़र पे ले चलो

जहां भूख की दुनिया न हो
जहां लूट के किस्से न हों
गलियों में मिलता हो सुकूं
ऐसी डगर पे ले चलो

मज़हब की दीवारें न हों
और दीन का पर्दा न हो
सजदे से मिलता हो ख़ुदा
मुझे ऐसे दर पे ले चलो

जहां सोच पर पहरा न हो
जहां ख़्वाब पर बंदिश न हो
जहां क़ैद में हों रूढ़ियां
उस कारागर पे ले चलो

जहां कोख में न क़त्ल हों
चेहरे पे न तेज़ाब हो
जहां मुस्कुराएं बेटियां
किसी ऐसे घर पे ले चलो

मज़दूर न मजबूर हों
और खेतिहर खुशहाल हों
जहां शाख़ पे न लाश हो
ऐसे शजर पे ले चलो

पगडंडियों को छोड़ कर
सड़कों पे न भटके कोई
जहां गांव जैसी बात हो
ऐसे शहर पे ले चलो

जहां रात अंधियारी न हो
जहां दोपहर तपती न हो
जहां शाम को सूरज उगे
ऐसी सहर पे ले चलो

ले चलो मुझे ले चलो
उस रहगुज़र पे ले चलो...