अपनी ही मौत पे, हज़ार बार रोया
चौखट पे अमीरों की, सिर मार-मार रोया
लहू का ज़र्रा-ज़र्रा फिर तार-तार रोया
नदी के साहिलों सा, आर-पार रोया
जीती हुई बाज़ी, मैं हार-हार रोया
पिंजरे के पंछी उड़ जा रे
ज़ंजीरें पिघला उड़ जा रे
हो जा हवा पे सवार
बनके बादलों का यार
नीले आसमां में दूर
हो के मस्तियों में चूर
अनजानी राह में मुड़ जा रे
पिंजरे के पंछी उड़ जा रे...
बाहें खोलेगा समंदर
जाना लहरों के अंदर
रेत पे फिसल न जाना
मिलेगा तुम्हें भी ठिकाना
मिट्टी से जा के जुड़ जा रे
पिंजरे के पंछी उड़ जा रे...
जंगल घनघोर अंधेरा
लेकिन होगा सवेरा
आशा की ओस बिछेगी
गहरी ये धुंध छंटेगी
धूप में घुल के उड़ जा रे
पिंजरे के पंछी उड़ जा रे...
ज़िंदगी में पाया जो भी
तेरे हिस्से आया जो भी
उसी को बना के अपना
आंखों में सजा के सपना
सुब्हो की नींद सा उड़ जा रे
पिंजरे के पंछी उड़ जा रे...
कहने को ज़िंदा हूं पर, ज़िंदा कहा के क्या करूं
लाश जैसा बोझ हूं, इस बोझ का मैं क्या करूं
है मर रही इन्सानियत, रोज़ मेरे सामने
हूं खड़ा लाचार, आए कोई हाथ थामने
एक बच्चे को बचा पाया नहीं मैं भूख से
देश की रक्षा को एटम बम बना के क्या करूं
ये ख़ून कैसा ख़ून है, जो बोलता न खौलता
चंद सिक्कों के लिए ईमान जिसका डोलता
बुत खड़े चुपचाप जैसे, हैं तमाशा देखते
जी रहे क्यों महल की, इन सीढ़ियों पे रेंगते
बाज़ुओं में ज़ोर कितना है, न हमसे पूछिए
मुल्क़ बिस्मिल का है ये, किस्सा सुना के क्या करूं
क्यों नहीं करता पहल, मैं पहले अपने आप से
कब तलक मरता रहूंगा, क्रोध से संताप से
हैं खड़े दुश्मन, ज़माने भर के मेरी राह में
मैं मगर डरता नहीं, इस ज़िन्दगी की चाह में
है अंधेरा रास्ता, इस बात का भी भय नहीं
रोशनी जो चुभ रही आंखों में उसका क्या करूं
कोई इक अनजान नगर हो
ज़ात की ना पहचान मगर हो
काम से सब पहचानें जाएं
नाम की ना जो भूख अगर हो
मंज़िल अलग-अलग हो बेशक
सबकी लेकिन एक डगर हो
मिलकर बांटें खुशियां लेकिन
सबके ग़म की हमें ख़बर हो
दूजे का कोई हक़ ना मारे
थोड़े में भी हमें सबर हो
छल और कपट न हो जीवन में
सीधा सा आसान सफ़र हो
अस्मत सबकी रहे सलामत
ऐसी उजली पाक़ नज़र हो
धूप लगे तो छांव बने जो
बरगद जैसा कोई शजर हो
धर्म के नाम पे ख़ून बहे ना
हंसती गाती राह गुज़र हो
जवां दिलों के ख़्वाब ना टूटें
ऐसी दिलकश शाम-सहर हो
शहर की ख़ातिर गांव न उजड़े
गांव के जैसा कोई शहर हो
छत के सुराख़ से
फर्श पर गिरती रोशनी
पकड़ी है कभी?
घुप्प अंधेरे कमरे में
जैसे चांद से उतर आई हो
कोई सीढ़ी उम्मीद की
कभी कोशिश की है
इस सीढ़ी को पकड़कर
चांद तक पहुंचने की?
उन्मुक्त उड़ जाने की?
बचपन में ताकत नहीं थी
नन्हे हाथों में
जितनी बार भी कोशिश करते
हाथ में कुछ न आता
फर्श पर लेकिन चमकता रहता
एक सफेद गोल चकत्ता
कुछ छोटे छोटे कीट-पतंगे
चढ़ जाते आसानी से उस रोशनी में
और देखते ही देखते आज़ाद घूमते
खुले गगन में
स्लेटों के सुराख़ कितने बड़े लगते थे तब
अब तो बरसों हो गए
उस रोशनी को देखे
भला पक्के मकानों की छत पर भी
सुराख़ होते हैं क्या??