Thursday, June 4, 2015

ख़्वाब-2

सुलगती हथेलियों में
अंजुरी भर ठंडे ख़्वाब
संजो कर रखे थे
इक ठोकर से छिटके
सीढ़ियों से बिखरते हुए जा गिरे
मेरी ड्योढ़ी पर
फिर फटी चप्पल से झांकती
एड़ियों के बीच
मसले गए
गर्म कुरकुरी रेत पर
एड़ियां नहीं छिलीं
लेकिन ताबीर छिल गई
मेरे ख़्वाबों की
अब डर डर के देते हैं दस्तक
मेरी ड्योढ़ी पर...

कब तलक

212 212 212 212
आपके प्यार में रोएंगे कब तलक
रात ढल जाएगी सोएंगे कब तलक।
ख्वाहिशें बोझ बन जाएंगी गर सभी
या ख़ुदा बोझ ये ढोएंगे कब तलक।
जो मिला राह में छूटता ही गया
इस तरह हमसफर खोएंगे कब तलक।
याद में जब कभी आएंगे हादसे
आंसुओं से उन्हें धोएंगे कब तलक।
नफरतों की फ़सल काटते तुम रहे
प्यार के बीज हम बोएंगे कब तलक।

Saturday, May 23, 2015

सलीब

आखिर अरुणा मर गई
और जाग गई हमारी करुणा
बयालिस साल बाद
कानून की दुहाई देते रह गए
कानून के रक्षक
और भक्षक आज़ाद हो गए
हम देखते रहे तमाशा
और हताशा फैलती रही
उन पथराई आंखों में
जिंदगी मरती रही तिल-तिल
इक उजाड़ बिस्तर पर
हम कनस्तर पीटते रहे कानून का
आज नहीं मरी अरुणा
वो तो मर गई थी बयालिस साल पहले
आज तो बस उतारी है
सलीब से...

Wednesday, May 13, 2015

अलविदा मैराज़

इक दिन अचानक
आ गया शाही फरमान
छोड़ कर चले जाओ यह जमीं
ये रस्ते, ये गलियां, ये घर
छोड़ कर चले जाओ ये पीपल
ये खेतों की मेढ़ें, ये पनघट
छोड़ कर चले जाओ स्कूल की घंटी
मस्जिद की अजान, टेंपो की डुग-डुग
छोड़ कर चले जाओ मेले की फिरकी
रंग-बिरंगी टॉफियां और लट्टू का खेल
छोड़ कर चले जाओ वो चुहलबाजियां
वो अल्हड़ गप्पें, वो बेबाक ठहाके
छोड़ कर चले जाओ अब्बा की ऐनक
अम्मी की साड़ी, भाई की किताबें,
बहन के गानों की कैसेट भी
छोड़ कर चले जाओ पकती हुई फसलों की खुशबू
चक्की की खर्र-खर्र, आंगन में सूखती आम की डलियां
... और मैं चला भी गया
पानी से घिरे टापू पर
फिर भी रहा प्यासा हमेशा
ख़ुश्क जैसे रेत सा
बिखरता भी रहा रेत की ही तरह
बरसों खींचता रहा लकीरें
बंजर जमीन की पेशानी पर
फिर इक दिन एक हवा के झोंके ने
ला पटका उसी जमीन पर
चंद रोज़ लगे, घुलने में, बहने में
फिल घुल ही गया आखिर उसी नम मिट्टी में
जहां से फेंका था तुमने
... आज मेरी कब्र खोद कर देखो
पिंजर बन चुकीं मेरी मुट्ठियों में
अब भी कैद है थोड़ी सी मिट्टी!!!

Monday, May 4, 2015

अंतर्मन

1222 1222 1222
करोगे जो कभी बातें फिज़ाओं से
मिटेंगी दूरियां दिल की खलाओं से

गरजने का अगर हो डर मिटाना तो
कभी दिल खोल कर मिलना घटाओं से

अकड़ना भी बहुत अच्छा नहीं होता
शजर भी टूट जाते हैं हवाओं से

ख़ुदा के सामने सजदा नहीं करते
मगर कुछ काम बनते हैं दुआओं से

मुहब्बत क्यों खुदाया सुकूं नहीं देती
कभी पूछो हसीनों से बलाओं से

Monday, April 27, 2015

खेत पर बवंडर

सर्द पहरे, ज़र्द चेहरे
सुर्ख आंखें, दर्द गहरे
फर्ज़ पर है कर्ज़ भारी
ज्यों पुराने मर्ज़ ठहरे

नींद गुम है, चैन गुम है
वो सुहानी रैन गुम है
है डराती रात काली
ख़्वाब सोचे थे सुनहरे

छत पे है नीला समंदर
खेत पर टूटे बवंडर
फरियाद पे सय्याद चुप है
होंठ बंद और कान बहरे

मौत पर ये शोर देखो
और सियासी ज़ोर देखो
लाश पर भी हैं निगाहें
आंसुओं के रंग दोहरे

खेल कैसा है मुक़द्दर
कहीं रेशम, कहीं खद्दर
मांग कर मिलता नहीं कुछ
तोड़ डालो आज पहरे

Monday, April 20, 2015

फिर इक दिन...

मत बोल सच्चाई चुभती है...
मत बोल सच्चाई चुभती है... 


प्यासी चिड़िया जब प्यास भुला कर दाना-दाना चुगती है
भूखे बच्चों का तन ढकने को तिनका-तिनका चुनती है
फिर इक दिन... ये सारे बच्चे फुर्र करके उड़ जाते हैं
मर जाते हैं वो सपने सब, जो आंखों में बुनती है
मत बोल सच्चाई चुभती है...

झूठी रौनक बिकती है, इन अंधियारे बाज़ारों में
जिस्मों के सौदे होते हैं, मक्कारों में, लाचारों में
फिर इक दिन... सारे रिश्ते पल भर में मिट जाते हैं
जब नोटों के चौराहे पर, भूखे की इज्जत बिकती है
मत बोल सच्चाई चुभती है...

टहनी पे गाती गोरैया, पिंजरे में डाली जाती है
पिंजरे में फिर आज़ादी की कीमत समझाई जाती है
फिर इक दिन... गोरैया वो घुट-घुट के मर जाती है
रस्मों की ख़ातिर ये दुनिया कुछ ऐसे पंख कतरती है
मत बोल सच्चाई चुभती है...

मंदिर की दीवारों पर भी फूल चढ़ाए जाते हैं
मस्जिद के वीरानों में भी चांद सजाए जाते हैं
फिर इक दिन... ये मंदिर-मस्जिद खंडहर से बन जाते हैं
जब धर्म के ठेकेदारों की कुर्सी खतरे में पड़ती है
मत बोल सच्चाई चुभती है...

मेहनतकश जब खून बहाकर मिट्टी में सोना बोते हैं
तब क्यों उनके भूखे-प्यासे बच्चे सड़कों पर रोते हैं
फिर इक दिन... अख़बारों में क्यों ऐसी ख़बरें आती हैं
खेत के कुएं के ऊपर, वो किसकी लाश लटकती है
मत बोल सच्चाई चुभती है...