इसीलिए इन दिनों खुला रहता है मेरा दर..
इसी आस में कि आएगा कोई
इक दस्तक सुनने को बेचैन मैं
हर छोटी सी आहट पर दौड़ पड़ता हूं
वक़्त की परछाईं पकड़ने.. लेकिन
वक़्त कब किसके हाथ आया है
हर बार वक़्त के फिसल जाने पर
मैं कोसता हूं बीते वक़्त को
मकड़ी के जाल से इस कालचक्र में
उलझा हुआ सा मैं
कर रहा हूं इक दस्तक का इंतजार...