Monday, October 6, 2025

दोराहा

एक दोराहे पर है खड़ी ज़िंदगी
एक दोराहे पर है पड़ी ज़िंदगी

चलते-चलते यूं ही रुक गया हूं कहीं 
जाने किस बात पर है अड़ी ज़िंदगी 

ये मजमे, ये रौनक, ये वीरानगी
ख़त्म कर देगी सब ये घड़ी ज़िंदगी

इम्तिहां जिंदगी के हैं मुश्किल बहुत
दर-ब-दर होके इनसे लड़ी ज़िंदगी

ढंग जीने का ना हमको आया कभी 
कशमकश है ये जालिम बड़ी ज़िंदगी 

उम्र गुज़री है सारी तक़ब्बुर में पर 
मौत के दर पे आकर खड़ी ज़िंदगी